[Best] 10+ Funny Stories in hindi For kids Funny short story with moral


Funny stories in Hindi


Today i share with all india  and more  peoples  to Top 10 funny stories in hindi for entertainment . i hop you like our stories.

All funny stories in hindi are  copyrighted i am only share all stories with all audiance for entertainment.
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फनी कहानीः शेर को मिला सवा सेर (funny dtory in hindi for kids with moral


एक जंगल था। वहां एक शेर रहता था। एक बार शेर को जंगल में खाने को कुछ नहीं मिला। शिकार के लिए वह पास के गांव में घुस गया। दूर से उसे एक झोपड़ी दिखाई दी। शेर ने सोचा यहां खाने को कुछ-न-कुछ जरूर मिल जाएगा। वह खिड़की के नीचे बैठ गया।
झोपड़ी के अंदर से बच्चे के रोने की आवाज आई। बच्चा लगातार रो रहा था। शेर इधर-उधर देखकर मकान में घुसने ही वाला था कि उसे औरत की आवाज आई, 'चुप हो जा बेटा, देखो लोमड़ी आ रही है। बाप रे, कितनी बड़ी लोमड़ी है।' लेकिन बच्चे ने रोना बंद नहीं किया।




बाप बेटे की फनी स्टोरी – गीता ज्ञान ना बाँटे(Funn story



पिता : ओ बेवकूफ़।
मैंने तुमको गीता दी थी पढ़ने के लिए क्या तुमने गीता पढ़ी ? कुछ। दिमाग मे घुसा।
पुत्र : हाँ पिताजी पढ़ ली, और अब आप मरने के लिए तैयार हो जाओ
( कनपटी पर तमंचा रख देता है )
पिता : बेटा ये क्या कर रहे हो ? मैं तुम्हारा बाप हूँ ।
पुत्र: पिताजी , ना कोई किसी का बाप है और ना कोई किसी का बेटा । ऐसा गीता में लिखा है ।
पिता : बेटा मैं मर जाऊंगा ।
पुत्र : पिताजी शरीर मरता है । आत्मा कभी नही मरती! आत्मा अजर है, अमर है ।
पिता : बेटा मजाक मत करो गोली चल जाएगी और मुझको दर्द से तड़पाकर मार देगी ।
पुत्र : क्यों व्यर्थ चिंता करते हो ? किससे तुम डरते हो । गीता में लिखा है-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः
आत्मा को ना पानी भिगो सकता है और ना ही तलवार काट सकती, ना ही आग जला सकती । किसलिए डरते हो तुम ।
पिता : बेटा! अपने भाई बहनों के बारे में तो सोच, अपनी माता के बारे में भी सोच ।
पुत्र : इस दुनिया में कोई किसी का नही होता । संसार के सारे रिश्ते स्वार्थों पर टिके है । ये भी गीता में ही लिखा है ।
पिता : बेटा मुझको मारने से तुझे क्या मिलेगा ?
बेटा : अगर इस धर्मयुद्ध में आप मारे गए तो आपको स्वर्ग प्राप्ति होगी । मुझको आपकी संपत्ति प्राप्त होगी ।
पिता : बेटा ऐसा जुर्म मत कर ।
पुत्र : पिताजी आप चिंता ना करें। जिस प्रकार आत्मा पुराने जर्जर शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करती है, उसी प्रकार आप भी पुराने जर्जर शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करने की तयारी करें ।
अलविदा ।
Moral- कलयुग की औलादों को सतयुग, त्रेतायुग या द्वापर युग की शिक्षा नहीं दे..


फुल एण्ड फाईनल (Short funny story with moral in hind for kids)


"अरे...तनेजा जी!...ये सब चोट-चाट कैसे लग गई?"....
"अब होनी को कौन टाल सकता है....शर्मा जी?"....
"फिर भी...पता तो चले कि आखिर हुआ क्या?"....
"सब भुट्टा खाने का नतीजा है"...
"भुट्टा खाने का?.....मैँ समझा नहीं....ज़रा खुल के बताएँ"....
"यार!..मेरी किस्मत ही फूटी थी जो मैँ उस राम प्यारी की बच्ची के पास भुट्टा खाने चला गया".....
"तो क्या उसकी बिटिया इतनी बड़ी और स्यानी हो गई कि खुद अपने बूते पे काम-धन्धा सँभाल सके?"...
"कमाल करते हो शर्मा जी आप भी...अभी तो उसके खेलने-कूदने के दिन हैँ और आप हो कि उसे काम-धन्धे में झोंकने की सोच रहे हो"...
"तो फिर ये सब किसका किया-धरा है?"शर्मा जी मुझे ऊपर से नीचे तक गौर से निहारते हुए बोले...
"उसी कम्बख्तमारी 'राम प्यारी' का...और भला पूरे मोहल्ले में कौन है जो मुझ पर ऊँगली भी उठा सके?"मैँ सीना फुला आहिस्ता से कराहते हुए बोला...
"तुमने ज़रूर उससे पंगा लिया होगा"...
"अजी कहाँ?...पंगा लिया होता तो इतना दुखी थोड़े ही होता"....
"तो फिर आखिर हुआ क्या?"...
"होना क्या था?...रोज़ाना की तरह कल भी मैँ मुँह में गुटका दबाए आराम से...हौले-हौले सड़क से गुज़र रहा था कि......
"भुट्टे भूनती राम प्यारी दिख गई?"...
"जी!...सही पहचाना"...
"अच्छा फिर?"...
"फिर क्या मैँने उससे इशारों-इशारों में पूछ लिया कि ये लम्बे वाला...भुट्टा कितने का है?"...
"फिर तो जूते पड़ने ही पड़ने थे"...
"वो भला क्यों?"...
"क्यों?...तुम्हारे मुँह में ज़बान नहीं थी जो लगे इशारे करने"...
"अरे!...अभी बताया ना कि मैँ गुटका चबा रहा था"....
"तो फिर फैंक देते"...
"अरे वाह!...ऐसे कैसे फैंक देता?"...
"पूरे गिन के दो रुपए खर्च किए थे..उन्हें क्या व्यर्थ में व्यर्थ हो जाने देता?"...
"ओह!....
"अच्छा फिर?"...
"फिर क्या?...मैँने उसे पहले एक ऊँगली दिखाई....
फिर दो ऊँगली दिखाई"....
"अब ऐसे भद्दे इशारे करोगे तो फिर पिटोगे ही"...
"शर्मा जी!...आप गलत सोच रहे हैँ...मैँने उस वे में ऊँगली नहीं दिखाई थी"...
"तो फिर किस वे में ऊँगली दिखाई थी?"
"जी!...मेरा मतलब तो बड़ा ही सीधा...सरल और सिम्पल था कि एक रुपया दूँगा और गिन के दो भुट्टे लूँगा"...
"हम्म!....फिर क्या हुआ?"...
"भुट्टा इतना बढिया और मीठा था कि एक में ही तबियत खुश हो गई"...
"फिर?"...
"फिर क्या?...मैँने बटुए में से अठन्नी निकाल उसकी हथेली पे धर दी कि...ले हो गया फुल एण्ड फाईनल"...
"फिर क्या हुआ?"....
"अठन्नी देखते ही पागल की बच्ची का दिमाग फिर गया...चिल्लाते हुए कहने लगी कि...
"बाबू!...ऐसे कैसे हो गया फुल एण्ड फाईनल?"....
"सीधे-सीधे निकालो दो का नोट"...
"तो फिर दे देते"...
"अरे वाह!...ऐसे-कैसे दे देता"....
"अच्छा फिर?"...
"फिर क्या?.....मैँ भी चौड़ा हो गया कि......
"एक ही तो भुट्टा खाया है....ऐसे कैसे दे दूँ...दो का नोट?"....
"फिर क्या हुआ?"...
"शायद मेरा भरा बटुआ देख  बेईमानी आ गई उल्लू की पट्ठी के दिमाग में...
"ओह!...
"भीड़ इकट्ठी कर ली"....
"ओह!....माई गॉड"....
"सबके सामने चिल्ला-चिल्ला के कहने लगी कि...."पहले तुमने एक ऊग़ली दिखाई?"...
"अच्छा फिर?"...
"मैँ कौन सा डरने वाला था?....बोला....
"हाँ!...बिलकुल दिखाई....कोई शक?"....
"गुड.....उसके बाद क्या हुआ?"....
"मेरे हामी भरते ही बावली में जोश भर गया...दूने उत्साह से कमर पे हाथ रख सीधे ही तूँ-तड़ाक करते हुए बोली.....
"उसके बाद तूने दो ऊँगली दिखाई?"...
"हाँ!...दिखाई.....आगे बोल"...
"तूने पहले एक ऊग़ली दिखाई कि एक भुट्टा लूँगा और बाद में दो ऊँगली दिखाई कि दो रुपया दूँगा"...
"अरे वाह!...बाप का माल समझ रखा है क्या?"...
"ऐसे कैसे दो रुपए दूँगा?...
"बस मेरा इतना कहना था कि आस-पास मजमा लगाई भीड़ में से कोई चिल्लाया...
"मारो!...स्साले को ...लेडीज़ के साथ बेईमानी करता है"...
"ओह!....फिर क्या हुआ?"...
"फिर क्या?...भीड़ ने मेरा फुल एण्ड फाईनल कर डाला"

साहब!...मक्खी ही तो है



ग्राहक वेटर से:सुनो!....मेरे सूप में मक्खी है
वेटर:छोड़िए ना साहब!...मक्खी ही तो है...कितना सूप पी जाएगी?
ग्राहक: बेवाकूफ!...पागल समझ रखा है क्या मुझे?...
वेटर:अगर आपको एतराज़ है तो लीजिए....मैँ अभी इसका काम तमाम किए देता हूँ



चमत्कार को नमस्कार




"ओ...बड़े दिनों में खुशी का दिन आया....
ओ...बड़े दिनों में खुशी का दिन आया....
आज मुझे कोई ना रोके...
बतलाऊँ कैसे कि मैँने क्या पाया....
हो बड़े दिनों में.....
"याहू!....
वो मारा पापड़ वाले ने"...
"क्या हुआ तनेजा जी?...इस कदर बल्लियों क्यों उछल रहे हैँ?...
"अरे शर्मा जी!...साक्षात  चमत्कार देख के आ रहा हूँ...साक्षात"....
"क्या सच?"....
"और नहीं तो क्या?"...
"हम भी तो सुनें भय्यी कि क्या चमत्कार देख के आ रहे हो?"...
"यूँ समझिए कि साक्षात ऊपरवाले ने अपने हाथों से गिफ्ट....
"तो क्या आज फिर किसी लड़की ने लिफ्ट?....
"तौबा...तौबा...कैसी बातें करते हैँ?"...
"क्यों?...पिछले हफ्ते तुम खुद ही तो बता रहे थे कि....
"शर्मा जी!...बन्दा एक बार धोखा खा सकता है...दो बार धोखा खा सकता है लेकिन सौ बार थोड़े ही कोई मुझे उल्लू बना पैसे ऐंठ सकता है"....
"तो फिर बताओ ना यार कि आखिर हुआ क्या?"शर्मा जी का उत्सुक स्वर...
"अजी!...यूँ समझिए कि धमाल हो गया"...
"अब कुछ बताओगे भी या यूँ ही बेकार में कमाल-धमाल कर के फुटेज खाते रहोगे?"....
"बताता हूँ....बताता हूँ....ज़रा सब्र तो रखिए"...
"अरे वाह!...इतनी देर से उतावले तो तुम खुद हुए जा रहे हो और अब मुझे सब्र रखने के लिए कह रहे हो?"...
"क्या शर्मा जी?...आप तो बात को पकड़ के बैठ जाते हैँ"...
"बैठ जाता हूँ?"...
"ध्यान से देखो!...मैँ बैठा हुआ नहीं बल्कि सीधा तन के खड़ा हुआ हूँ"शर्मा जी सीना तान छाती फुलाते हुए बोले...
"हे...हे...हे...शर्मा जी...आपके भी सैंस ऑफ ह्यूमर का जवाब नहीं"...
"थैंक्स फॉर दा काम्प्लीमैंट"...
"इसमें थैंक्स की क्या बात है?...यू डिज़र्व इट"....
"हक बनता है आपका"...
"ओ.के....ओ.के...बाबा"....
"चलो!...अब फटाफट पूरी बात बताओ"...
"शर्मा जी!...जल्दी क्या है?"....
"आप ही तो कहा करते हैँ कि जल्दी का काम शैतान का होता है...आराम से सुनिए"...
"ठीक है भैय्ये!...तो फिर टिका ले अपनी तशरीफ  यहाँ...फुटपाथ पे और तसल्ली से बता"शर्मा जी एक तरफ इशारा करते हुए बोले...
"जी...शर्मा जी"मैँ भी आराम से चौकड़ी मार बैठता हुआ बोला...
"दरअसल हुआ क्या कि मैँ अपने  नए स्कूटर पे...
"अरे वाह!...नया स्कूटर?.....कब लिया?"शर्मा जी चौंकने वाले अन्दाज़ में उठ खड़े हो गए...
"जी!...बस...यही कोई दो-चार दिन ही हुए हैँ"...
"अमाँ यार!...तुम तो बड़े ही छुपे रुस्तम निकले..किसी को कानों कान खबर भी नहीं होने दी और झट से मार लिया मैदान"...
"अब शर्मा जी!...अपने मुँह से कैसे कहता?.....आप तो मेरा नेचर जानते ही हैँ"मैँ मन ही मन फूल के कुप्पा होता हुआ बोला
"फिर तो भय्यी!....पार्टी बनती है हमारी"...
"हाँ-हाँ...क्यों नहीं?"...
"आप ही का दिया सब कुछ है"....
"जब चाहें...ले लें"...
"ना...तनेजा जी...ना....पार्टी से बचने का ये तरीका तो बरसों पुराना हो गया"...
"मेरे सामने आपका ये टोटका नहीं चलने वाला"...
"सीधे-सीधे निकालिए सौ का पत्ता और बन्ने खाँ की दुकान से गर्मागर्म जलेबी मँगवाईए"...
"हाँ-हाँ ...क्यों नहीं"...
"एक मिनट!....(स्कूटर को घूर के देखते हुए)
"ओए तनेजा!....
"जी!...शर्मा जी"....
"छोड़!.....ये पार्टी-शार्टी का चक्कर तू रहने दे"....
"कमाल करते हो शर्मा जी!...आपकी एक आवाज़ पे मैँने जेब के अन्दर हाथ डाल दिया और आप हैँ कि....
"तो दूसरी आवाज़ पे उसणे बाहर काढ ले...के दिक्कत सै?"...
"ना..दिक्कत तो कोई नहीं है जी...लेकिन....
"इस लेकिण-वेकिण ने अड़े छोड़ और जा...
खा कमा....मौज कर"...
"कह दिया ना कि जा...मैँ नहीं लेता"...
"वो तो आपको लेनी पड़ेगी"....
"कोई जबर्दस्ती है?"...
"कुछ भी समझ लें"...
"पागल हो गया है क्या तू?"...
"शर्मा जी!.....आप तो मेरे बारे में अच्छी तरह से जानते हैँ कि मैँ उसूलों का बड़ा पक्का आदमी हूँ"...
"तो?"...
"पहले तो कभी किसी को जल्दी से हाँ नहीं करता और अगर गलती से कभी किसी को हाँ कर भी दी तो फिर भूल के भी कभी ना नहीं करता"...
"अब मर्द की ज़बान जो ठहरी....कर दी...सो कर दी"....
"अब तो आप इसे पत्थर पे लिखी लकीर ही समझिए"...
"तो फिर झाड़ू मार पत्थर पे...अपने आप मिट जाएगी ससुरी....के दिक्कत सै?"...
"ना शर्मा जी!...ना....अब तो बेशक धरती इधर की उधर हो जाए....ये तनेजा...
ये तनेजा तो आपको पार्टी दे कर ही रहेगा"मैँ छाती ठोक गरजदार आवाज़ में बोला...
"अरे यार!...समझा कर"....
"क्यों?...मेरा पैसा आपको हज़म नहीं होगा?"....
"नहीं!...ये बात नहीं है"...
"तो फिर आखिर दिक्कत क्या है?"....
"छोड़ ना!..क्यों बेकार में सौ-दो सौ फूँकता है...बचा के रख...आड़े वक्त काम आएँगे"...
"शर्मा जी!...बात को घुमाईए मत और सीधे-सीधे बताईए कि आप पार्टी लेंगे या नहीं?"...
"जा!...नहीं लूँगा...कर ले जो तुझे करना हो"...
"पार्टी तो आपके फरिशते भी लेंगे"मैँ आस्तीन ऊपर कर त्योरियाँ चढाता हुआ बोला...
"ठीक सै...तो फिर एक मिनट की भी देर ना कर"...
"जी"मैँ अपनी कामयाबी पे खुश होता हुआ बोला
"जा...सीधा ऊपर जा.....तेरी ही बाट देख रहे हैँ कई दिनों से"...
"कौन?"...
"मेरे फरिशते...और कौन?"...
"क्या?"...
"जा!...कई दिनों से तेरा ही इंतज़ार कर रहे हैँ"...
""कई दिनों से?"...
"हाँ!..कई दिनों से"...
"वो भला क्यूँ?"...
"स्वर्ग में कई दिनों से अच्छा भोजन ना मिलने के कारण भूख हड़ताल करे बैठे हैँ"...
"सच में?"...
"हाँ!...जा के उन्हें ही दे दे अपनी पार्टी"...
"आप मज़ाक कर रहे हैँ ना?"...
"ओर नय्यी ते के मैँ तन्ने सीरियस दीख रेया सूँ?"...
"ओह!...फिर ठीक है"...
"अब फटाफट गोली हो ले यहाँ से"...
"शर्मा जी!...मान जाइए ना...प्लीज़"...
"कह दिया ना एक बार कि नहीं चाहिए मुझे तेरी ये पार्टी-शार्टी"...
"वो तो आपको लेनी ही पड़ेगी"...
"बेटे!...समझा कर....ज़िद ना कर"..
"क्या समझूँ?...कैसे समझूँ?...और क्यों समझूँ?"....
"एक बार जो ठान लिया...सो ठान लिया"...
"पार्टी देनी है...तो हर हाल में देनी है"...
"अरे!...अजीब पागलपन है....मुझे अगर नहीं लेनी है...तो किसी भी कीमत पर नहीं लेनी है"...
"वो तो आपको लेनी पड़ेगी"मैँ बच्चों की तरह ज़िद पे अड़ा रहा...
"ना!...बिलकुल ना"...
"शर्मा जी!...आप मेरे साथ ज़्यादती कर रहे हैँ"...
"कुछ भी समझ ले"...
"ना!..मैँ तो नहीं मानने वाला....पार्टी तो आपको लेनी ही पड़ेगी"...
"कोई ज़बरदस्ती है?"....
"यही समझ लीजिए"...
"ओफ्फो!...कह दिया ना एक बार कि नहीं लूँगा..नहीं लूँग़ा...नहीं लूँगा"...
"आखिर आपको दिक्कत क्या है?....परेशानी क्या है?"...
"अरे!....जो कँगला पैट्रोल तक के पैसे नहीं खर्च कर सकता...वो क्या खाक पार्टी देगा"...
"किसने कहा आपसे कि मैँ पैट्रोल के पैसे नहीं खर्च कर सकता?"...
"कहना या सुनना किस से है?"...मुझे साफ-साफ दिखाई दे रहा है"....
"क्या दिखाई दे रहा है?"...
"यही कि पैसे खर्च करने की तेरी औकात नहीं है"...
"औकात पे मत जाइए...कहे देता हूँ"...
"जाऊँगा!....एक नहीं सौ बार जाऊँगा...कर ले...जो तुझे करना हो"....
"शर्मा जी!...आप शायद ठीक से जानते नहीं हैँ मुझे वर्ना...ऐसी बात करने से पहले सौ बार सोचते"...
"औकात तो मेरी इतनी है कि यहीं खड़े-खड़े मैँ आपको....
"अरे जा-जा!...तेरे जैसे छत्तीस आए और चले गए"...
"तू अपने ससुराल वालों के दम पे कूद रहा है ना?"....
"आने दे उन्हें भी मैदान ए जंग में...देखें कौन किसका पानी भरता है?"...
"तुझे और तेरे रिश्तेदारों को...सभी को अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम में से कौन कितने पानी में है"...
"आप मेरी सास को बार-बार बीच में क्यों ला रहे हैँ?"...
"और अगर औकात नहीं होती क्या मैँ ये नवां-नकोर स्कूटर खरीद के लाता?"मैँ लगभग रुआँसा होता हुआ बोला...
"पागल के बच्चे!...ध्यान से देख...ये 'स्कूटर' नहीं बल्कि 'स्कूटरी' है"...
"तेरा ये 'कबूतर' ....'कबूतर' नहीं बल्कि 'कबूतरी' है.....हा...हा...हा...हा"....
"शर्मा जी!...आप बड़े है...बुज़ुर्ग हैँ लेकिन इसका मतलब ये नहीं हो जाता कि आप अपने से छोटॉं की भावनाओं से खिलवाड़ करें"....
"अपने होश औ हवास पे काबू रखें और जब तक...जहाँ तक सम्भव हो सके...मेरा मज़ाक ना उड़ाएँ...प्लीज़"...
"अरे भय्यी!...किसने कहा तुमसे कि मैँ तुम्हारा मज़ाक उड़ा रहा हूँ?"...
"ये मज़ाक नहीं तो और क्या है? कि आप मेरे अच्छे भले किंग साईज़ के 'स्कूटर' को 'स्कूटरी' बता उसके साथ-साथ मुझे भी नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैँ"....
"अरे भाई!...मैँ किसी की तौहीन नहीं कर रहा हूँ और ना ही मेरा ऐसा कोई इरादा है"...
"झूठ!...बिलकुल झूठ"...
"ओफ्फो!..कैसे विश्वास दिलाऊँ तुम्हें?"...
"मेरे सर पे हाथ रख कर कसम खाएँ कि जो कुछ कह रहे हैँ...सच कह रहे हैँ और सच के सिवा कुछ भी नहीं कह रहे हैँ"....
"हाँ भय्यी!...सच कह रहा हूँ...तुम्हारी कसम"...
"तो आपका मतलब ये 'स्कूटर' नहीं है"...
"बिलकुल"...
"तो फिर आपके हिसाब से 'स्कूटर' किसे कहते हैँ?"...
"'स्कूटर' उसे कहते हैँ जो पैट्रोल से चलता है और आपका ये तो छकड़ा पैट्रोल से नहीं बल्कि 'बैट्री' से चलता है ना?"...
"बैट्री से चलता है तो इसका मतलब ये 'स्कूटर' ना हो कर 'स्कूटरी' हो गया?"...
"बिलकुल"...
"ये आपसे किस गधे ने कह दिया?"...
"कहना किसने है?...मुझे खुद पता है"....
"शर्मा जी!...मेरे साथ...ये दोगला...ये सौतेला व्यवहार सिर्फ इसलिए ना कि....

ये कीमत में कम है...

सरकार इस पर सबसिडी दे रही है...

ये शोर नहीं करता...

प्रदूशन नहीं फैलाता...

बिना किक के स्टार्ट हो जाता है?...वगैरा....वगैरा"...

"ये सब मुझे नहीं पता"...
"तो फिर क्या पता है आपको?"...
"यही कि ये स्कूटर नहीं है"...
"अच्छा चल...अगर तुझे मेरी बात पे विश्वास नहीं है तो राह चलते किसी भी ऐरे-गैरे को रोक के पूछ ले कि ये 'स्कूटर' है के 'स्कूटरी'?"...
"शर्मा जी!...अभी मेरा वक्त इतना गया-बीता नहीं हुआ है किसी ऐरे-गैरे...नत्थू-खैरे से राय लेने की नौबत पड़ जाए मुझे"...
"वैसे आप ये बताने की कृपा करेंगे कि किस ऐगल से ये आपको 'स्कूटरी' दिखाई दे रही है?"...
"तो तुझे ही ये कौन से कोण से 'स्कूटर' दिखाई दे रहा है?"...
"ये देखिए!...हाँ-हाँ इसी ऐंगल से"मैँ लगभग ज़मीन पे लेट उन्हें ऐंगल समझाता हुआ बोला....
"दिखा ना?"...
"क्या?"...
"यही कि लम्बाई...चौड़ाई और मोटाई के हिसाब से ये किसी भी 'स्कूटर' से कम नहीं है"...
"सिर्फ लम्बाई...चौड़ाई और मोटाई से क्या होता है?"...
"क्यों?...होता क्यों नहीं है...बहुत कुछ होता है"....
"ओ.के!...ओ.के बाबा...तुमसे बहस में कोई नहीं जीत सकता"....
"आई.एम सॉरी....माफ कर दो मुझे"...
"वो किसलिए?"...
"कि मैँने तुमसे पंगा मोल लिया"...
"शर्मा जी!...कमाल करते हैँ आप भी"....
"आप मेरे बुज़ुर्ग हैँ...संगी-साथी हैँ....इतना तो आपका हक बनता ही है"...
"थैंक्स...कि तुमने मुझे इस लायक समझा"...
"चलो!...बात तो खत्म हुई"...
"वैसे भी क्या फर्क पड़ता है?...स्कूटर हो या स्कूटरी...दोनों एक समान"...
"अरे वाह!...फर्क क्यों नहीं पड़ता...ज़मीन और आसमान का फर्क पड़ता है"...
"क्या फर्क पड़ता है?"...
"आपको मैँ अगर मर्द के बजाए औरत कह कर पुकारूँ तो आपको बुरा लगेगा या नहीं?"...
"ज़रूर लगेगा"...
"बस इसीलिए मुझे भी लग रहा है"...
"मतलब?"...
"आप मेरे जवाँ मर्द स्कूटर को ज़बर्दस्ती 'स्कूटरी' कह स्त्री साबित करने पर तुले हैँ तो मेरा बुरा मानना जायज़ ही तो है"...
"लेकिन स्कूटर और स्कूटरी की बहस के बीच में ये मर्द और औरत कैसे आ गए?"...
"वो ऐसे कि स्कूटर मर्द होता है और स्कूटरी स्त्री"...
"मतलब?"...
"मतलब कि स्कूटर चलता है...इसलिए वो मर्द है"...
"और स्कूटरी चलती है...इसलिए वो औरत हो गई?"...
"जी"...
"वाह!...क्या लॉजिक है"...
"तुम्हारा मतलब मोटर साईकिल और कार दोनों चलती है तो इसका मतलब ये दोनों स्त्रियों की श्रेणी में आएँगी?"...
"यकीनन"...
और ऑटो मर्द की श्रेणी में?"...
"जी!...सही पहचाना आपने"...
"जैसे 'बस' चलती है और 'ट्रक' चलता है?"...
"बिलकुल"...
"इसका मतलब तो रेलगाड़ी औरत है और हवाई जहाज़ मर्द"...
"जी बिलकुल"..
"लेकिन एक कंफ्यूज़न है?"...
"क्या?"...
"यही कि 'बुलेट' तो सबसे शक्तिशाली बाईक है ना?"...
"जी"...
"तो वो तो मर्द ही कहलाएगी ना?"....
"जी नहीं...'बुलेट' भी स्त्री ही कहलाएगी"...
"लेकिन वो तो सबसे शक्तिशाली....
"ऐसे तो 'हिडिम्बा' भी बहुत शक्तिशाली थी...लेकिन वो राक्षसी थी...राक्षस नहीं"...
"कम्पनी खुद अपने प्रचार में कहती है कि जब 'बुलेट' चले तो दुनिया रास्ता दे"...
"जी"...
"तो इसका मतलब एक औरत के लिए....
"जी!...ये तो यहाँ की रीत है"...
"मतलब?"....
"इसे कहते हैँ अपनी परंपराओं से जुड़े रहना"...
"?...?...?....?"...
"?...?...?....?"... "?...?...?....?"... "?...?...?....?"...
"हम महान भारत देश के वासी हैँ...हमारे यहाँ सदियों से स्त्रियों का सम्मान किया जाता रहा है...अभी भी किया जाता है और हमेशा किया जाता रहेगा"...
"जी!...ये बात तो है"...
"तो अब आपकी तसल्ली हो गई ना कि....
"हाँ भय्यी...हो गई...पूरी तसल्ली हो गई कि ये 'स्कूटरी' नहीं बल्कि 'स्कूटर' है"...
"जी"...
"लेकिन स्पीड?.....स्पीड का क्या?...वो तो इसकी बहुत ही कम....
"जी!...20 से 25 किलोमीटर प्रति घंटे की है"मेरा मायूस स्वर...
"यही इसकी सबसे बड़ी कमई है"...
"हाँ!....लेकिन अगर आप रफ्तार से समझौता कर सकते हैँ तो बाकी सब चीज़ों में इसका कोई सानी नहीं"...
"अरे हाँ शर्मा जी!...स्पीड से याद आया कि वो कमाल...वो चमत्कार तो स्पीड को लेकर ही था"...
"ओह!...इसका मतलब बातों-बातों में हम असली...मुद्दे की बात तो भूल ही गए"...
"जी"...
"हाँ!...अब बताओ कि क्या हुआ था?"...
"जैसा कि मैँ आपको बता रहा था कि...
"क्या तुम्हारी ये स्कूटरी...ऊप्स सॉरी स्कूटर...25 की स्पीड से ज़्यादा तेज़ भाग गया?"...
"आप तो अंतरयामी है...आपको कैसे पता चला?"...
"अभी तुमने ही तो कहा कि मैँ अंतरयामी  हूँ"...
"शर्मा जी!...मज़ाक छोड़िए और सीरियसली बताईए ना कि आपको कैसे पता चला?"....
"अरे यार!...अभी तुमने ही तो कहा"...
"तो?"...
"भय्यी!...तुम स्पीड के साथ चमत्कार की बात कर रहे थे तो मैँने अन्दाज़ा लगाया कि ज़रूर इसकी गति तेज़ हो गई होगी"...
"जी...बिलकुल सही अन्दाज़ा लगाया आपने"...
"अब मुझे शुरू से...वर्ड टू वर्ड बताओ कि कैसे ये चमत्कार घटित हुआ?"...
"अब क्या चमत्कार हुआ?...ये तो मैँने आपको बता दिया लेकिन कैसे चमत्कार हुआ?...इस रहस्य से मैँ बिलकुल अनजान हूँ"...
"ठीक है!...आगे बोलो"...
"दरअसल!...हुआ क्या कि दूसरों कि देखा-देखी...खुशी-खुशी से चाव-चाव में मैँने इसे ले तो लिया लेकिन फिर इसकी मरियल स्पीड देख के जल्द ही दुखी हो परेशान भी हो गया"...
"ओह!...फिर?"...
"शर्मा जी!...मेरा दिल ही जानता है कि पिछले दो दिनों में इसकी स्पीड को तेज़ करने के लिए क्या-क्या जतन नहीं किए मैँने?"...
"मन्दिर...मस्जिद और गुरूद्वारे से लेकर चर्च तक मैँ कहाँ-कहाँ नहीं भटका?...
"तो?"...
"कोई मकैनिक...कोई कारीगर...कोई वर्कशाप नहीं छोड़ी मैँने"...
"ओह!...फिर?"...
""नतीजा वही ढाक के तीन पात"...
"मतलब?"...
"सारे क्रिया-क्रम फेल हो गए..
"दुखी हो कई बार इतना गुस्सा आया कि इसे ले जा के सीधा शो-रूम वाले के वहीं पटक आऊँ कि ले!...सम्भाल अपना टीन-टब्बर"....
"एक-दो बार तो बड़े उलटे-उलटे ख्यालात दिल में उमड़ने लगे"...
"वो क्या?"...


बरसात पैसों की (Short stories in hind



"अरे तनेजा जी!...ये क्या?...मैँने सुना है कि आपकी पत्नि ने आपके ऊपर वित्तीय हिंसा का केस डाल दिया है"....
"हाँ यार!...सही सुना है तुमने"मैँने लम्बी साँस लेते हुए कहा
"आखिर ऐसा हुआ क्या कि नौबत कोर्ट-कचहरी तक की आ गई?"...
"यार!...होना क्या था?..एक दिन बीवी प्यार ही प्यार में मुझसे कहने लगी कि तुम्हें तो ऐसी होनहार....सुन्दर....सुघड़ और घरेलू पत्नि मिली है कि तुम्हें खुश हो कर मुझ पर पैसों की बरसात करनी चाहिए"...
"तो?"...
'"मैँने कहा ठीक है"...
"फिर?"...
"फिर क्या?...एक दिन जैसे ही मैँने देखा कि बीवी नीचे खड़ी सब्ज़ी खरीद रही है...मैँने आव देखा ना ताव और सीधा निशाना साध सिक्कों से भरी पोटली उसके सर पे दे मारी"...


थोडा मुस्कुरा लीजिये - लघु हास्य कहानी(Hindi  funny storiesin moral)



दो भाई थे। एक की उम्र 8 साल दूसरे की 10 साल। दोनों बड़े ही शरारती थे। उनकी शैतानियों से पूरा मोहल्ला तंग आया हुआ था। माता-पिता रातदिन इसी चिन्ता में डूबे रहते कि आज पता नहीं वे दोनों क्या करें।
एक दिन गांव में एक साधु आया। लोगों का कहना था कि बड़े ही पहुंचे हुये महात्मा है। जिसको आशीर्वाद दे दें उसका कल्याण हो जाये। पड़ोसन ने बच्चों की मां को सलाह दी कि तुम अपने बच्चों को इन साधु के पास ले जाओ। शायद उनके आशीर्वाद से उनकी बुध्दि कुछ ठीक हो जाये। मां को पड़ोसन की बात ठीक लगी। पड़ोसन ने यह भी कहा कि दोनों को एक साथ मत ले जाना नहीं तो क्या पता दोनों मिलकर वहीं कुछ शरारत कर दें और साधु नाराज हो जाये।
अगले ही दिन मां छोटे बच्चे को लेकर साधु के पास पहुंची। साधु ने बच्चे को अपने सामने बैठा लिया और मां से बाहर जाकर इंतजार करने को कहा ।
साधु ने बच्चे से पूछा – ”बेटे, तुम भगवान को जानते हो न ? बताओ, भगवान कहां है ?”
बच्चा कुछ नहीं बोला बस मुंह बाए साधु की ओर देखता रहा। साधु ने फिर अपना प्रश्न दोहराया । पर बच्चा फिर भी कुछ नहीं बोला। अब साधु को कुछ चिढ़ सी आई। उसने थोड़ी नाराजगी प्रकट करते हुये कहा – ”मैं क्या पूछ रहा हूं तुम्हें सुनाई नहीं देता । जवाब दो, भगवान कहां है ?
” बच्चे ने कोई जवाब नहीं दिया बस मुंह बाए साधु की ओर हैरानी भरी नजरों से देखता रहा।
अचानक जैसे बच्चे की चेतना लौटी। वह उठा और तेजी से बाहर की ओर भागा। साधु ने आवाज दी पर वह रूका नहीं सीधा घर जाकर अपने कमरे में पलंग के नीचे छुप गया। बड़ा भाई, जो घर पर ही था, ने उसे छुपते हुये देखा तो पूछा – ”क्या हुआ ? छुप क्यों रहे हो ?”
”भैया, तुम भी जल्दी से कहीं छुप जाओ।” बच्चे ने घबराये हुये स्वर में कहा।
”पर हुआ क्या ?” बड़े भाई ने भी पलंग के नीचे घुसने की कोशिश करते हुये पूछा।
”अबकी बार हम बहुत बड़ी मुसीबत में फंस गये हैं। भगवान कहीं गुम हो गया है और लोग समझ रहे हैं कि इसमें हमारा हाथ है!"


संता और सर्दी - हास्य कहानी(Best funny hindi story in moral)


एक बार संता को गांव का सरपंच बना दिया गया. गांव वालों ने सोचा कि छोरा पढ़ा-लिखा है, समझदार है, अगर ये सरपंच बन गया तो गांव की भलाई के लिए काम करेगा.
मौसम बदला, सर्दियों के आने के महीने भर पहले गांव वालों ने संता से पूछा - सरपंच साहब इस बार सर्दी कितनी तेज पड़ेगी.
संता ने गांव वालों से कहा कि मैं आपको कल बताऊंगा. संता तुरंत ही शहर की ओर निकल गया. वहां जाकर
मौसम विभाग में पता किया तो मौसम विभाग वाले बोले - सरपंच साहब इस बार बहुत तेज सर्दी पड़ने
वाली है.
संता भी दूसरे दिन गांव में आकर ऐसा ही बोल दिया. गांव वालों को विश्वास था कि अपने सरपंच साहब पढ़े-लिखे हैं. शहर से पता करके आये हैं तो सही कह रहे होंगे. गांव वालों की नजर में संता की इज्जत और बढ़ गयी.
तेज सर्दी पड़ने की बात सुनकर गांव वालों ने सर्दी से बचने के लिए लकड़ियां इकट्ठी करनी शुरू कर दी।
महीने भर बाद जब सर्दियों का कोई नामोंनिशान नहीं दिखा तो गांव वालों ने संता से फिर पूछा. संता ने उन्हें
फिर दूसरे दिन के लिए टाला, और शहर के मौसम विभाग में पहुंच गया.
मौसम विभाग वाले बोले कि सरपंच साहब आप चिंता मत करो। इस बार सर्दियों के सारे रिकॉर्ड टूट जायेंगे.
संता ने ऐसा ही गांव में आकर बोल दिया. संता की बात सुनकर गांव वाले पागलों की तरह लकड़ियां इकट्ठी करने लग गए. इस तरह पंद्रह दिन और बीत गए लेकिन सर्दियों का कोई नामोंनिशान नहीं दिखा. गांव वाले
संता के पास आये. संता फिर मौसम विभाग जा पहुंचा.
मौसम विभाग वालों ने फिर वही जवाब दिया कि सरपंच साहब आप देखते जाइये कि सर्दी क्या जुल्म ढाती है. संता फिर से गांव में आकर ऐसा ही बोल दिया. अब तो गांव वाले सारे काम-धंधे छोड़कर सिर्फ लकड़ियां इकट्ठी करने के काम में लग गए. इस तरह पंद्रह दिन और बीत गए. लेकिन सर्दियां शुरू नहीं हुईं.
गांव वाले संता को कोसने लगे. संता ने उनसे एक दिन का वक्त और मांगा. संता तुरंत मौसम विभाग पहुंचा तो उन्होंने फिर ये जवाब दिया कि सरपंच साहब इस बार सर्दियों के सारे रिकॉर्ड टूटने वाले हैं. अब संता का भी धैर्य जवाब दे गया.
संता ने पूछा - आप इतने विश्वास से कैसे कह सकते हैं.
मौसम विभाग वाले बोले कि सरपंच साहब हम पिछले दो महीने से देख रहे हैं. पड़ोस के गांव वाले पागलों की तरह लकड़ियां इकट्ठी कर रहे हैं. इसका मतलब सर्दी बहुत तेज पड़ने वाली है.
संता वहीं चक्कर खाकर गिर गया.




साधारण युवती सिखा गई अकबर को ‘खुदा की बंदगी’(Hindi story for fun for kids with moral)




एक बार बादशाह अकबर जंगल में घूमने के लिए निकलें। रास्ते में चलते-चलते नमाज का वक्त हुआ। बादशाह ने दरी बिछाकर नमाज पढना शुरु किया। इतने में एक युवती अपने पतिदेव को ढूंढती हुई उधर से निकली। उसका ध्यान दरी पर नहीं होने से वह उस पर पैर रखकर निकल गई।
बादशाह ने देखा तो वे गुस्सा हो उठे। वे बोले-क्या तुम्हें यह दिखाई नहीं दिया की मैं नमाज पढ रहा हूं? मैं खुद की बंदगी में लीन था, यह देखते हुए भी तुम मेरी दरी पर पैर रखकर चली गईं। युवती ने यह बात सुनी, तो जवाब मे उसने एक दोहा पढा-
“नर राची सूझी नहीं, तुम कस लख्यों सुजान। पढि कुरान बौरे भयो, नहीं राच्यौ रहमान॥”
मैं तो अपने प्रियतम की खोज मैं मग्न थी, इसलिए मेरा ध्यान आपकी ओर नहीं गया, मगर आप तो भगवान की भक्ति में लीन थे, फिर भला आपने मुझे कैसे देख लिया। लग्ता है आपका ध्यान नमाज की ओर नहीं, मेरी ओर था जबकि मेरा ध्यान मेरे प्रिय में होने से आपकी तरफ नही था।
युवती की बात सुनकर अकबर ने कहा-अब वह नमाज पढते समय अपना पूरा खयाल खुदा में रखेगा।
मां ने फिर कहा, 'वह देखो, भालू आ गया... भालू खिड़की के बाहर बैठा है। बंद करो रोना, नहीं तो भालू अंदर आ जाएगा', लेकिन बच्चे का रोना जारी रहा। खिड़की के नीचे बैठा शेर सोच रहा था, 'अजीब बच्चा है यह! न लोमड़ी से डरता है, न भालू से।'
बच्चा अब भी रोए जा रहा था। 'देखो... देखो...', मां की आवाज आई, 'देखो, शेर आ गया शेर। वह रहा खिड़की के नीचे।' लेकिन बच्चे का रोना, फिर भी बंद नहीं हुआ। यह सुनकर शेर को बहुत ताज्जुब हुआ और बच्चे की बहादुरी से उसको डर लगने लगा।
'वह कैसे जान गई कि मैं खिड़की के पास हूं। बच्चा भी गजब बहादुर है। मेरा नाम सुनकर भी नहीं डरा', शेर ने सोचा। शेर ने आज तक ऐसा कोई जीव नहीं देखा था, जो उससे न डरता हो। लेकिन यह बच्चा तो डर ही नहीं रहा था। उल्टे शेर को उससे डर लगने लगा।
'लो अब चुप रहो। यह देखो किशमिश...।' मां ने कहा तो बच्चे ने फौरन रोना बंद कर दिया। शेर ने सोचा, 'यह किशमिश कौन है? बड़ा खूंखार होगा।' तभी कोई भारी चीज धम्म से शेर की पीठ पर गिरी। शेर जान बचाकर वहां से भागा। उसने सोचा कि उसकी पीठ पर किशमिश ही कूदा होगा।
असल में उसकी पीठ पर एक चोर कूदा था, जो उस घर में गाय-भैंस चुराने आया था। अंधेरे में शेर को गाय समझकर वह छत से उसकी पीठ पर कूद गया। डरा तो चोर भी। उसकी तो जान ही निकल गई, जब उसे पता चला कि वह शेर की पीठ पर सवार है। शेर बहुत तेजी से पहाड़ी की ओर दौड़ा, ताकि किशमिश नीचे गिर पड़े, लेकिन चोर ने भी कसकर शेर को पकड़ रखा था। वह जानता था कि अगर वह नीचे गिरा तो शेर उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा। शेर को अपनी जान का डर था और चोर को अपनी जान का।
थोड़ी देर में सुबह का उजाला होने लगा। चोर को एक पेड़ की डाली दिखाई दी। उसने जोर से डाली पकड़ी और तेजी से पेड़ के ऊपर चढ़कर छिप गया। शेर की पीठ से छुटकारा पाकर उसने चैन की सांस ली।
शेर ने भी चैन की सांस ली, 'भगवान को धन्यवाद मेरी जान बचाने के लिए। किशमिश तो सचमुच बहुत भयानक जीव है।' और शेर भूखा-प्यासा वापस पहाड़ी पर अपनी गुफा में चला गया।

  • इंसान को सबसे प्यारा क्या होता है?(funny hindi short story with moral)



हमेशा की तरह उस दिन भी अकबर व बीरबल बातचीत करने में मशगूल थे। अचानक बादशाह ने पूछा, ‘‘बीरबल! किसी भी इंसान को सबसे प्यारा क्या होता है ?’’

बीरबल ने तुरन्त उत्तर दिया, ‘‘हुजूर! हर प्राणी को अपनी जान से प्यारा और कुछ नहीं होता।’’

‘‘क्या तुम इसे सिद्ध कर सकते हो ?’’ बादशाह ने पूछा।

‘‘हाँ, क्यों नहीं।’’ बीरबल का जवाब था।

कुछ दिन बाद बीरबल एक बंदर  का बच्चा लेकर आया, बच्चे की माँ भी साथ थी।

महल में बगीचे के ठीक बीचोबीच एक तालाब बना था। बीरबल ने नौकरों से कहा कि तालाब खाली कर दें। उसने यह भी कहा कि खाली तालाब के बीच में एक लंबा बाँस गाड़ दें। इसके बाद बीरबल ने उस बंदर  के बच्चे और उसकी माँ को खाली तालाब में छुड़वा दिया और नौकरों को आदेश दिया कि तालाब को फिर से पानी से धीरे-धीरे भर दें।

बादशाह यह सबकुछ बेहद ध्यानपूर्वक देख रहे थे। जैसे-जैसे पानी का स्तर बढ़ रहा था, वैसे-वैसे बंदरिया अपने बच्चे को सीने से चिपकाए तालाब के बीच गड़े बांस पर ऊपर चढ़ती जा रही थी।

अब पानी का स्तर इतना बढ़ चुका था कि बंदरिया की कमर तक आ पहुंचा था। बंदरिया ने अपने बच्चे को अपने हाथों में पकड़ा और बांस के सबसे ऊपरी सिरे पर जा बैठी।

यह देखकर बादशाह बोले, ‘‘देखा बीरबल! बंदरिया अपने बच्चे की जान बचाने के लिए कितनी मेहनत कर रही है। इसका मतलब तो यह हुआ कि बच्चे की जान इसे अपनी जान से कहीं ज्यादा प्यारी है।’’

इस बीच पानी का स्तर बढ़कर बंदरिया की गर्दन तक आ पहुँचा था। यहां तक कि उसके नाक-कान में भी पानी भरने लगा था। लगता था कि कुछ ही देर में वह पानी में डूब जाएगी।

कुछ देर बंदरिया ने इधर-उधर ताका और उसके बाद बच्चे पर पैर रखकर खड़ी हो गई। अब वह अपने बच्चे के ऊपर खड़ी पानी से बाहर आने की चेष्टा कर रही थी।

‘‘अब देखिए जहांपनाह।’’ बीरबल बोला, ‘‘यह बंदरिया अपनी जान बचाने के लिए अपने बच्चे तक की परवाह नहीं कर रही। बच्चे को अपने पैरों तले डालकर अपनी जान बचाने की कोशिश में है। क्या यह सब सिद्ध नहीं करता कि अपनी जान सबसे ज्यादा प्यारी होती है।’’

बादशाह से कोई जवाब देते न बन पड़ा। वह बोले, ‘‘बीरबल! तुम ठीक ही कहते थे, जीवन सभी को प्यारा होता है।

बीरबल मुस्कराया और नौकरों को निर्देश दिया कि पानी का स्तर कम कर दें ताकि बंदरिया और उसके बच्चे को बाहर निकाला जा



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